Tajawal

Saturday, 5 March 2016

आंदोलन की आड़ में महिलाओं से गैंगरेप!

कहते हैं भीड़ का कोई चेहरा नहीं होता और दंगाइयों के सीने में दिल नहीं होते. हरियाणा में हुए हिंसक जाट आंदोलन के बाद अब जो गुनाह के निशान बाकी बचे हैं, वो कुछ यही कहानी बयान करते हैं. सोनीपत के नजदीक मुरथल में जली हुई गाड़ियों के पास सड़क से लेकर खेतों तक बिखरे महिलाओं के कपड़े क्या महज इत्तेफाक हैं? या फिर इसके पीछे आंदोलन की आड़ में दसियों महिलाओं के साथ हुए गैंगरेप की रौंगटे खड़े कर देने वाली कहानी छिपी है?
लेकिन जब खाकी में लिपटे कानून के मुहाफिजों से लेकर खद्दर में सिमटे सूबे के हुक्मरान तक, सभी अपने कानों में तेल डाल कर सो जाएं, तो भला आवाम की फरियाद कौन सुने? लिहाजा, अखबारों की सुर्खियों के बाद सुरागों की शक्ल में बिखरे वारदात के इन सुबूतों को खुद इंसाफ के मंदिर में बैठे पुजारियों ने ही समेटने का बीड़ा उठाया. पंजाब एंड हरियाणा हाई कोर्ट ने सरकार से इन तस्वीरों की तह तक पहुंचने की ताकीद कर डाली.
 
20 से 22 फरवरी तक आंदोलन की आग में बुरी तरह जलने के बाद जब हरियाणा शांत हुआ, तो दिल्ली से तकरीबन 48 किलोमीटर दूर मुरथल में लोगों को हाईवे किनारे की तस्वीरों ने चौंका दिया. ये तस्वीरें दूर-दूर तक बिखरे महिलाओं के कपड़ों की थीं. इत्तेफाक से ये सभी कपड़े महिलाओं के थे. उसी जगह पर चंद रोज पहले आंदोलन की आड़ में गुंडों ने भयानक कोहराम मचाया था. हावे से गुजरती गाड़ियों को रोक कर आग के हवाले कर दिया था. लोगों के साथ मारपीट और महिलाओं से बदतमीजी की थी. क्या वो सिर्फ बदतमीजी थी या फिर लोगों की मजबूरियों का फायदा उठा कर महिलाओं के साथ गैंगरेप भी हुआ था?जब सब कुछ देखते हुए भी पुलिस ने हकीकत जानने की कोशिश किए बगैर अपनी आंखें फेर ली, तो इस मंजर पर सवाल खड़े हुए. खबर आई कि गैंगरेप की वारदात के बाद कुछ पीड़ित महिलाओं ने जब पुलिस से फरियाद की, तो पुलिस ने इसकी शिकायत लिखने की बजाय लोकलाज का डर दिखा कर उन्हें चुप रहने की हिदायत दी. खबर यह भी आई कि दरिंदों के चंगुल से छूटने के बाद कुछ महिलाओं ने पास ही एक ढाबे में जाकर अपनी जान भी बचाई और तब ढाबे के मुलाजिमों ने उन्हें खाली पड़े पानी के टैंक में छुपने की जगह भी दी थी. लेकिन जब पुलिस ने सिरे से तमाम सवालों को खारिज कर दिया, तो हाई कोर्ट को बीच में आना पड़ा. तब शुरू हुई दस से ज्यादा महिलाओं के साथ हुए गैंगरेप की सबसे बड़ी तफ्तीश.
जो लोग मुरथल में गैंगरेप की कचोटने वाली कहानियों के चश्मदीद थे, आज उनके लबों पर ताले लगे हैं. कल तक जो दबी जुबान से दरिंदगी के किस्से बयान कर रहे थे, आज वो सब चुप बैठे हैं. ऐसे में दस से ज्यादा महिलाओं के साथ कथित गैंगरेप की असली कहानी कभी सामने भी आएगी, ये एक बड़ा सवाल है.. सड़क के किनारे बिखरे लेडीज कपड़ों से लेकर जली हुई गाड़ियों तक को देखते ही पहली नजर में ये शक पैदा होता है कि यहां महिलाओं के साथ रेप या गैंगरेप जैसी कोई वारदात जरूर हुई है.
जाट आंदोलन के दौरान यहां गुंडों ने मुसाफिरों के साथ लूटपाट की थी. मुमकिन है कि इस लूटपाट के दौरान वहां किसी मुसाफिर का ब्रिफकेस टूट कर गिर गया, जिससे ये कपड़े बिखर गए. पुलिस का यहां तक कहना है कि अगर किसी लड़की के साथ यहां गुंडों ने गैंगरेप ही किया होता, तो कोई ना कोई शिकायत लेकर उनके पास जरूर पहुंचता. पुलिस तो यहां तक कह रही है कि उन्हें ना तो ऐसी किसी वारदात का कोई चश्मदीद मिला और ना ही अब तक की जांच में आस-पास के ढाबों या दुकानों में लगे सीसीटीवी कैमरों में ऐसी किसी वारदात की तस्वीरें मिलीं.
लेकिन तर्क की कसौटी में पुलिस का ये इनकार फिलहाल कमज़ोर नजर आता है. सवाल ये है कि अगर वहां कपड़े किसी के साथ हुई लूटपाट के दौरान ही गिरे, तो सिर्फ महिलाओं के कपड़े ही क्यों मिले? ऐसी सूरत में वहां लेडीज अंडर गार्मेंट्स के अलावा दूसरी चीजे भी पड़ी होनी चाहिए थीं. अखबार में छपी रिपोर्ट्स के मुताबिक तो नग्न हालत में कुछ महिलाएं पास के ढाबे में मदद मांगने के लिए भी पहुंची थी.
आरोप तो यहां तक है कि पुलिस ने ही शिकायत के लिए आई महिलाओं को लोकलाज और कानून का डर दिखा कर थाने से चलता कर दिया था. जबकि पुलिस खुद भी ये मानती है कि अब तक तमाम सीसीटीवी फुटेज की जांच पूरी नहीं हुई है. दस गैंगरेप के इस संदिग्ध मामले में पुलिस के काम करने के तौर-तरीके पर ही सबसे बड़ा सवाल है. शायद इसी बात को देखते हुए हाई कोर्ट ने इस वारदात को ना सिर्फ शर्मसार करने वाला करार दिया है, बल्कि यहां तक कहा है कि उनके पास मामले को सीबीआई के हवाले करने का भी ऑप्शन है.
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